
एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार, कैलास पर्वत पर एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि वे विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने के बाद ही भोजन करेंगी।
तब भगवान शिव ने श्रीराम नाम की महिमा बताते हुए कहा कि वे निरंतर ‘राम! राम! राम!’ का जाप करते हैं और श्रीराम नाम को सहस्त्रनाम के समान मानते हैं।
भगवान शिव द्वारा कहा गया प्रसिद्ध श्लोक है—
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।
अर्थात् हे सुंदर मुख वाली पार्वती! ‘राम’ नाम का जप सहस्त्रनाम के पाठ के समान माना गया है।
इसी प्रसंग में भगवान शिव आगे कहते हैं—
रकारादीनि नामानि शृण्वतो मम पार्वति।
मनः प्रसन्नतां याति रामनामाभिशंकया।।
अर्थात् हे पार्वती! ‘र’ से आरंभ होने वाले नामों को सुनते ही मेरा मन ‘राम’ नाम के स्मरण की भावना से प्रसन्न हो जाता है।
माता पार्वती ने भगवान शिव की बात मानकर श्रीराम नाम का उच्चारण किया और भोजन किया। इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीराम के अन्य नामों के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की।
परंपरा में भगवान श्रीराम के अनेक नामों का वर्णन मिलता है। इनमें से 108 नामों को विशेष महत्व दिया गया है। प्रत्येक नाम भगवान श्रीराम के किसी विशेष गुण, स्वरूप, लीला या दिव्य विशेषता को दर्शाता है।
ॐ श्रीराम — जिनमें योगीजन रमण करते हैं, ऐसे सच्चिदानंद स्वरूप श्रीराम।
रामचन्द्र — चंद्रमा के समान मनोहर।
रामभद्र — कल्याणमय राम।
शाश्वत — सनातन भगवान।
राजीवलोचन — कमल के समान नेत्रों वाले।
श्रीमान् राजेन्द्र — श्रीसम्पन्न और राजाओं के राजा।
रघुपुंगव — रघुकुल में सर्वश्रेष्ठ।
जानकीवल्लभ — माता सीता के प्रियतम।
जैत्र — विजयशील।
जितामित्र — शत्रुओं को जीतने वाले।
जनार्दन — सभी मनुष्यों द्वारा याचना किए जाने योग्य।
विश्वामित्रप्रिय — महर्षि विश्वामित्र के प्रिय।
दान्त — जितेन्द्रिय।
शरण्यत्राणतत्पर — शरणागतों की रक्षा में तत्पर।
वालिप्रमथन — वानरराज बालि का वध करने वाले।
वाग्मी — उत्तम वक्ता।
सत्यवाक् — सत्य बोलने वाले।
सत्यविक्रम — सत्य पराक्रम से युक्त।
सत्यव्रत — सत्य का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले।
व्रतफल — समस्त व्रतों के फलस्वरूप।
सदा हनुमदाश्रय — हनुमानजी के हृदय में निवास करने वाले।
कौसल्येय — माता कौसल्या के पुत्र।
खरध्वंसी — खर राक्षस का नाश करने वाले।
विराधवधपण्डित — विराध का वध करने में कुशल।
विभीषणपरित्राता — विभीषण की रक्षा करने वाले।
दशग्रीवशिरोहर — रावण के मस्तकों का संहार करने वाले।
सप्ततालप्रभेत्ता — एक ही बाण से सात तालवृक्षों को भेदने वाले।
हरकोदण्डखण्डन — भगवान शिव के धनुष को तोड़ने वाले।
जामदग्न्यमहादर्पदलन — परशुरामजी के महान अभिमान को चूर्ण करने वाले।
ताटकान्तकृत् — ताड़का का वध करने वाले।
वेदान्तपार — वेदान्त से भी परे।
वेदात्मा — वेदस्वरूप।
भवबन्धैकभेषज — संसार-बंधन से मुक्ति की औषधि।
दूषणत्रिशिरोऽरि — दूषण और त्रिशिरा के शत्रु।
त्रिमूर्ति — ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप धारण करने वाले।
त्रिगुण — तीनों गुणों के आश्रय।
त्रयी — तीनों वेदों के स्वरूप।
त्रिविक्रम — वामन अवतार में तीन पगों से त्रिलोकी को नापने वाले।
त्रिलोकात्मा — तीनों लोकों के आत्मस्वरूप।
पुण्यचारित्रकीर्तन — जिनके चरित्र का कीर्तन पवित्र माना जाता है।
त्रिलोकरक्षक — तीनों लोकों की रक्षा करने वाले।
धन्वी — धनुष धारण करने वाले।
दण्डकारण्यवासकृत् — दण्डकारण्य में निवास करने वाले।
अहल्यापावन — अहल्या का उद्धार करने वाले।
पितृभक्त — पिता के प्रति भक्तिभाव रखने वाले।
वरप्रद — वर प्रदान करने वाले।
जितेन्द्रिय — इन्द्रियों को वश में रखने वाले।
जितक्रोध — क्रोध पर विजय पाने वाले।
जितलोभ — लोभ को जीतने वाले।
जगद्गुरु — अपने चरित्र से संसार को शिक्षा देने वाले।
ऋक्षवानरसंघाती — वानर एवं भालू सेना को संगठित करने वाले।
चित्रकूटसमाश्रय — चित्रकूट में निवास करने वाले।
जयन्तत्राणवरद — जयन्त की रक्षा कर उसे वर देने वाले।
सुमित्रापुत्रसेवित — लक्ष्मणजी द्वारा सेवित।
सर्वदेवाधिदेव — सभी देवताओं के देवता।
मृतवानरजीवन — वानरों को पुनर्जीवन प्रदान करने वाले।
मायामारीचहन्ता — मायावी मारीच का वध करने वाले।
महाभाग — महान सौभाग्यशाली।
महाभुज — विशाल भुजाओं वाले।
सर्वदेवस्तुत — सभी देवताओं द्वारा स्तुत।
सौम्य — शांत एवं सौम्य स्वभाव वाले।
ब्रह्मण्य — ब्राह्मणों के हितैषी।
मुनिसत्तम — मुनियों में श्रेष्ठ।
महायोगी — महान योगी।
महोदार — परम उदार।
सुग्रीवस्थिरराज्यद — सुग्रीव को स्थिर राज्य प्रदान करने वाले।
सर्वपुण्याधिकफल — समस्त पुण्यों के उत्कृष्ट फलस्वरूप।
स्मृतसर्वाघनाशन — जिनके स्मरण से पापों के नाश की मान्यता है।
आदिपुरुष — आदि परमात्मा।
महापुरुष — समस्त पुरुषों में महान।
परम पुरुष — सर्वोत्कृष्ट पुरुष।
पुण्योदय — पुण्य को प्रकट करने वाले।
महासार — परम सारस्वरूप।
पुराणपुरुषोत्तम — पुराणों में वर्णित पुरुषोत्तम।
स्मितवक्त्र — जिनके मुख पर सदा मुस्कान रहती है।
मितभाषी — कम और सारगर्भित बोलने वाले।
पूर्वभाषी — स्वयं आगे होकर बोलने वाले।
राघव — रघुकुल में अवतीर्ण।
अनन्तगुणगम्भीर — अनंत गुणों से युक्त और गंभीर।
धीरोदात्तगुणोत्तर — धीर एवं उदात्त गुणों से युक्त।
मायामानुषचारित्र — मनुष्य के समान दिव्य लीलाएं करने वाले।
महादेवाभिपूजित — भगवान शिव द्वारा पूजित।
सेतुकृत् — समुद्र पर सेतु का निर्माण करने वाले।
जितवारीश — समुद्र पर विजय प्राप्त करने वाले।
सर्वतीर्थमय — समस्त तीर्थों के स्वरूप।
हरि — पाप और ताप को हरने वाले।
श्यामांग — श्याम वर्ण वाले।
सुन्दर — परम मनोहर।
शूर — अनुपम शौर्य से सम्पन्न।
पीतवासा — पीताम्बर धारण करने वाले।
धनुर्धर — धनुष धारण करने वाले।
सर्वयज्ञाधिप — समस्त यज्ञों के स्वामी।
यज्ञ — यज्ञस्वरूप।
जरामरणवर्जित — बुढ़ापे और मृत्यु से रहित।
शिवलिंगप्रतिष्ठाता — रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना करने वाले।
सर्वाघगणवर्जित — समस्त पापराशि से रहित।
परमात्मा — नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त परमात्मा।
परं ब्रह्म — सर्वव्यापी परमेश्वर।
सच्चिदानन्दविग्रह — सत्, चित् और आनंदमय दिव्य स्वरूप।
परं ज्योति — परम प्रकाश एवं ज्ञानस्वरूप।
परं धाम — परम धामस्वरूप।
पराकाश — महाकाशस्वरूप ब्रह्म।
परात्पर — मन और बुद्धि से परे परमात्मा।
परेश — सर्वोच्च शासक।
पारग — सबको भवसागर से पार लगाने वाले।
पार — परम लक्ष्यस्वरूप।
सर्वभूतात्मक — समस्त प्राणियों में आत्मस्वरूप।
शिव — परम कल्याणमय।
परंपरागत मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के इन दिव्य नामों का पाठ और श्रवण अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। श्रीराम के श्यामसुंदर, कमलनयन और पीताम्बरधारी स्वरूप का ध्यान करते हुए उनके नामों का स्मरण करने से भक्त के भीतर श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक आध्यात्मिक भाव जागृत होते हैं।
धार्मिक ग्रंथों में इसके अनेक आध्यात्मिक एवं धार्मिक फल बताए गए हैं। इनमें संसार के बंधनों से मुक्ति, पापों के क्षय, मन की शांति, भगवान के प्रति भक्ति तथा जीवन में मंगल की कामना जैसे भाव प्रमुख हैं।
इसी भाव को श्रीराम नाम की भक्ति में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है—
लोकाभिरामं रणरंगधीरं
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये।।
अर्थात् रणभूमि में धीर, कमल के समान नेत्रों वाले, रघुवंश के स्वामी और करुणा के स्वरूप भगवान श्रीराम की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
श्रीराम का नाम केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों की श्रद्धा और भक्ति का आधार है। रामायण की कथाओं से लेकर संतों की वाणी तक, ‘राम’ नाम का जाप भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखता है।
भक्ति की परंपरा में माना जाता है कि भगवान के नाम का स्मरण मन को एकाग्र करने और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना को गहरा करने का माध्यम बन सकता है।
आइए, भगवान श्रीराम के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हुए स्मरण करें—
जय श्रीराम।
जय जय श्री पवनपुत्र हनुमानजी।